दान की महिमा - रेणु जैन कर्ण, दधीचि और राजा हरीशचंद्र जैसे परम दानी भारत में ही हुए हैं जिन्होंने दुनिया के सामने दान की मिसाल कायम की । पुराणों में अनेक तरह के दानों का उल्लेख मिलता है जिनमें अन्नदान, विद्यादान, अभयदान और धनदन को श्रेष्ठ माना गया है । यूँ ही नहीं कहा जाता कि एक हाथ से दान करो, तो दूसरे हाथ को पता नहीं चलना चाहिए । निस्वार्थ भाव से किया गया दान ही सही मानये में दान कहलाता है । यूनिवर्सिटी आॅफ बुफेलो के शोधकर्ता माइकल जे. पाॅलिन ने एक शोध किया जिसमें उन्होंने पाया कि दूसरों को सहयोग करना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है । समाज से अलग-थलग रहने वाले और तनाव में जीने वाले लोग जल्दी ही शारीरिक रूग्णता के शिकार होने लगते हैं जबकि वहीं दूसरों की मदद करने से हमें लंबी उम्र की प्राप्ति होती है । वेदों और पुराणों में कहा गया है कि दान देने से हममें परिग्रह करने की प्रवृत्ति नहीं आती । मन में उदारता का भाव रहने से विचारों में शुद्धता आती है । मोह तथा लालच नहीं रहता । दान करने से हम न सिर्फ दूसरों का भला करते हैं बल्कि अपने व्यक्तित्व को भी निखारते हैं । जब हम दान बिना किसी ...
Comments
Post a Comment